रांची स्थित झारखंड हाईकोर्ट ने पुराने हत्या मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। अदालत ने तीन आरोपियों को दोषमुक्त घोषित कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अपराध संदेह से परे साबित होना जरूरी है। मामले में केवल एक प्रत्यक्षदर्शी गवाह पर निर्भरता पाई गई। न्यायालय ने इसे पर्याप्त साक्ष्य नहीं माना। खंडपीठ ने सभी दस्तावेजों और गवाही की जांच की। अदालत ने पाया कि आरोप साबित करने के लिए मजबूत आधार नहीं था। न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति अरुण कुमार राय ने फैसला सुनाया। निर्णय के बाद आरोपियों को बड़ी राहत मिली। अदालत ने निष्पक्ष न्याय के सिद्धांत को दोहराया।
निचली अदालत का 4 फरवरी 1998 का दोषसिद्धि आदेश रद्द कर दिया गया। साथ ही 5 फरवरी 1998 का सजा आदेश भी समाप्त कर दिया गया। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष संदेह दूर नहीं कर सका। आरोपियों को संदेह का लाभ दिया गया। पहले से जमानत पर होने के कारण बेल बांड समाप्त कर दिया गया। अदालत ने क्रिमिनल अपील स्वीकार कर ली। न्यायालय ने कहा कि न्याय केवल आरोप नहीं बल्कि प्रमाण पर आधारित होता है। फैसले से कानूनी प्रक्रिया की गंभीरता स्पष्ट हुई। इस निर्णय को कानूनी हलकों में अहम माना जा रहा है। न्यायालय ने साक्ष्य की गुणवत्ता पर विशेष टिप्पणी की।
यह मामला 23 जनवरी 1996 की हत्या घटना से जुड़ा था। सोनाहातु थाना क्षेत्र के जामुदाग तुंगरी गांव में घटना हुई थी। मृतक की हत्या तलवार और फरसा से की गई थी। अभियोजन ने जमीन विवाद को कारण बताया था। तीनों आरोपियों को आईपीसी की धारा 302/34 के तहत सजा दी गई थी। निचली अदालत ने उन्हें आजीवन कारावास सुनाया था। मामले की सुनवाई वर्षों तक चलती रही। हाईकोर्ट ने साक्ष्य की कमी को निर्णायक माना। अदालत ने कहा कि संदेह की स्थिति में सजा नहीं दी जा सकती। फैसले के साथ लंबित विवाद का कानूनी अंत हो गया।



