रामगढ़ की सड़कों पर शोर-शराबा तो है, लेकिन आज उस मोहल्ले में खामोशी हावी है जहां पार्वती रहती थी।
मां जब घर लौटी, वो सोच रही थी कि बेटी दरवाज़ा खोलकर मुस्कुराएगी। लेकिन आज दरवाज़ा खुला था और सामने मौत खड़ी थी। पड़ोसी भागकर आए, लेकिन वे सिर्फ बेबस गवाह ही बन सके।
पुलिस अब जांच कर रही है, लेकिन जिंदगी चली गई। सवाल बाकी हैं — क्या कोई उसका दर्द समझ पाता तो आज वो जिंदा होती?


