झारखंड हाईकोर्ट ने खनन से जुड़े दो मामलों में मुआवजा राशि की वापसी से इनकार कर दिया है। दोनों याचिकाओं में करीब 2.42 करोड़ रुपये लौटाने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता विजय कुमार ओझा और अनिल खिरवाल ने अदालत का रुख किया था। पश्चिमी सिंहभूम के जिला खनन पदाधिकारी ने वर्ष 2017 में दोनों से मुआवजा मांगा था। यह मांग Mines and Minerals Development and Regulation Act की धारा 21(5) के तहत की गई थी। विजय कुमार ओझा से 33,60,863 रुपये की मांग हुई थी। अनिल खिरवाल के मामले में राशि 2,08,39,666 रुपये थी। दोनों ने 30 दिसंबर 2017 को मांगी गई रकम जमा कर दी थी। इसके बाद उन्होंने लंबे समय तक इस मांग को अदालत में चुनौती नहीं दी। हाईकोर्ट ने इसी देरी को मामले में महत्वपूर्ण माना।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि जिला खनन पदाधिकारी को धारा 21(5) के तहत मुआवजा मांगने का अधिकार नहीं था। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने धारा 26(2) के तहत ऐसी शक्ति का प्रत्यायोजन नहीं किया था। दोनों ने हाईकोर्ट के 4 मार्च 2025 के फैसले का हवाला दिया। उस फैसले में समान मामलों में जिला खनन पदाधिकारियों के मांग नोटिस रद्द किए गए थे। अदालत ने उन मामलों में जमा राशि वापस करने का निर्देश भी दिया था। राज्य सरकार की ओर से दाखिल एसएलपी भी 15 दिसंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट में खारिज हो चुकी थी। इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने अपनी जमा रकम ब्याज सहित वापस करने की मांग की। उनका तर्क था कि अधिकारविहीन अधिकारी की ओर से जारी मांग स्वतः शून्य थी। इसलिए उसे अलग से चुनौती देने की जरूरत नहीं थी। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने की।
खंडपीठ ने कहा कि दोनों याचिकाकर्ताओं ने वर्ष 2017 की मांग को कभी चुनौती नहीं दी थी। उन्होंने रकम जमा करने के बाद करीब नौ वर्षों तक कोई कार्रवाई नहीं की। अदालत के अनुसार 2025 में समान मामलों में राहत मिलने के बाद उन्होंने रिफंड का रास्ता अपनाया। कोर्ट ने कहा कि पहले के मामलों में संबंधित पक्षकारों ने अपने अधिकारों के लिए समय पर कदम उठाए थे। वर्तमान याचिकाकर्ताओं की स्थिति उन मामलों से अलग थी। अदालत ने माना कि वे पुराने फैसले का लाभ बाद में लेना चाहते थे। इसी वजह से उन्हें फेंस सिटर की श्रेणी में माना गया। खंडपीठ ने कहा कि केवल बाद के फैसले के आधार पर पहले किए गए भुगतान की वापसी नहीं मांगी जा सकती। अदालत ने असाधारण रिट क्षेत्राधिकार में उन्हें राहत देने से इनकार कर दिया। इसके साथ ही दोनों याचिकाएं खारिज कर दी गईं। करीब 2.42 करोड़ रुपये की मुआवजा राशि वापस करने की मांग पर हाईकोर्ट का फैसला याचिकाकर्ताओं के पक्ष में नहीं रहा।



