झारखंड में देशी शराब की बिक्री में पिछले पांच वर्षों के दौरान उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। उत्पाद विभाग के आंकड़ों से यह स्थिति सामने आई है। बिक्री में आई कमी का असर राज्य के राजस्व पर भी पड़ा है। विभागीय रिपोर्ट के अनुसार यह गिरावट लगातार बनी हुई है। पहले की तुलना में देशी शराब की मांग कम हुई है। इससे सरकार की आय में भी कमी दर्ज की गई है। विशेषज्ञों ने इस बदलाव के कई कारण बताए हैं। अवैध शराब की ओर बढ़ते रुझान की आशंका भी व्यक्त की गई है। इससे जहरीली शराब की घटनाओं को लेकर चिंता बढ़ी है। पूरे मामले पर विभिन्न स्तरों पर चर्चा जारी है।
उत्पाद विभाग के अनुसार वर्ष 2020-21 में 75.30 लाख एलपीएल देशी शराब की बिक्री हुई थी। वर्ष 2025-26 में यह घटकर 25.78 लाख एलपीएल रह गई। इस दौरान लगभग 75 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। पहले कुल शराब राजस्व में देशी शराब की हिस्सेदारी 8 से 9 प्रतिशत थी। अब यह घटकर लगभग 1.5 प्रतिशत रह गई है। विभाग के आंकड़े लगातार गिरावट को दर्शाते हैं। इससे उत्पाद विभाग के सामने नई चुनौतियां खड़ी हुई हैं। राजस्व संग्रह पर भी इसका सीधा असर पड़ा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पैकेजिंग नीति में बदलाव इसका प्रमुख कारण हो सकता है। पहले देशी शराब प्लास्टिक पाउच में बेची जाती थी। उत्पाद नीति 2022 लागू होने के बाद इसे शीशे की बोतलों में पैक किया जाने लगा। इससे कीमत बढ़ गई। कम कीमत वाली शराब खरीदने वाले उपभोक्ताओं की पसंद बदलने की संभावना जताई गई है। महुआ से बनी अवैध शराब की ओर रुझान बढ़ने की आशंका भी व्यक्त की गई है। इससे सार्वजनिक स्वास्थ्य पर खतरा बढ़ सकता है। अवैध शराब की रोकथाम के लिए प्रभावी कार्रवाई की आवश्यकता बताई जा रही है। साथ ही जागरूकता अभियान चलाने पर भी जोर दिया जा रहा है। आने वाले समय में इस विषय पर सरकार के कदम महत्वपूर्ण होंगे।



