रांची : झारखंड हाईकोर्ट ने वन भूमि विवाद से जुड़ी जनहित याचिका पर अपना फैसला सुनाया। अदालत ने याचिका का निष्पादन करते हुए अतिरिक्त निर्देश जारी नहीं किए। यह याचिका शिव शंकर शर्मा द्वारा दायर की गई थी। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने की। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता की साख संदेह के घेरे में है। न्यायालय ने गंभीर आरोपों के समर्थन में पर्याप्त साक्ष्य नहीं पाए। अदालत ने कहा कि केवल आरोपों के आधार पर केंद्रीय एजेंसियों से जांच नहीं कराई जा सकती। ऐसे आदेश विशेष परिस्थितियों में ही दिए जाते हैं। इसलिए अदालत ने नई जांच का आदेश देने से इनकार कर दिया।
याचिका में वन भूमि की अवैध बिक्री का आरोप लगाया गया था। अधिकारियों की मिलीभगत की भी बात कही गई थी। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार पहले से मामले की जांच कर रही है। इसलिए सीबीआई और ईडी जांच का कोई औचित्य नहीं बनता। न्यायालय ने कहा कि कई आरोप प्रमाणित नहीं हुए हैं। कुछ आरोप काफी देर से लगाए गए हैं। अदालत ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। फिर भी न्यायिक निर्णय केवल उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही लिया जा सकता है। लंबित मामलों का फैसला स्वतंत्र रूप से होगा। इस आदेश को किसी भी पक्ष के लिए क्लीन चिट नहीं माना जाएगा।
सरकार ने अदालत को जांच की विस्तृत जानकारी दी। 2,003 बिक्री विलेखों की जांच की गई थी। इनमें केवल 74 विलेख वन क्षेत्र से जुड़े पाए गए। करीब 91.53 एकड़ भूमि वन सीमा के भीतर मिली। लगभग 11.49 एकड़ भूमि पर अतिक्रमण पाया गया। संबंधित मामलों में वन अपराध दर्ज किए जा चुके हैं। अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है। अदालत ने कहा कि किसी भी बिक्री विलेख के लिए वन विभाग ने एनओसी जारी नहीं की थी। अधिकारियों की मिलीभगत का आरोप रिकॉर्ड से सिद्ध नहीं हुआ। इसी आधार पर अदालत ने जनहित याचिका का निष्पादन कर दिया।


