झारखंड हाईकोर्ट ने समयपूर्व रिहाई से जुड़े मामलों की समीक्षा करते हुए राज्य सरकार से जवाब मांगा है। अदालत ने स्वतः संज्ञान से दर्ज जनहित याचिका पर सुनवाई की। कोर्ट ने पूछा कि बोर्ड की बैठक तीन महीने के भीतर क्यों नहीं हुई। सरकार ने बताया कि मार्च 2026 में पिछली बैठक हुई थी। जून में अगली बैठक आयोजित नहीं हो सकी। कुछ प्रशासनिक कारणों का हवाला अदालत के सामने रखा गया। सरकार ने कहा कि 30 जुलाई को बैठक तय की गई है। हाईकोर्ट ने देरी के कारणों का विस्तृत स्पष्टीकरण मांगा। साथ ही बैठक के निर्णयों की स्टेटस रिपोर्ट भी तलब की। अदालत ने समयबद्ध प्रक्रिया अपनाने पर जोर दिया।
सुनवाई में झालसा की ओर से अधिवक्ता शुभम मिश्रा उपस्थित रहे। हाईकोर्ट की ओर से वरीय अधिवक्ता अमित कुमार दास ने पक्ष रखा। अदालत को बताया गया कि मार्च की बैठक में 86 मामलों की समीक्षा हुई थी। इनमें 44 दोषियों की समयपूर्व रिहाई को मंजूरी मिली थी। 42 मामलों को अस्वीकार किया गया था। अदालत ने कहा कि ऐसी बैठकों में अनावश्यक विलंब उचित नहीं है। नियमित समीक्षा न्यायिक प्रक्रिया का अहम हिस्सा है। इससे पात्र दोषियों को समय पर राहत मिल सकती है। कोर्ट पूरी प्रक्रिया पर लगातार निगरानी रखे हुए है। अगली सुनवाई में सरकार की रिपोर्ट पर विचार किया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार प्रत्येक तीन महीने में बैठक आयोजित करना अनिवार्य है। झारखंड हाईकोर्ट इसी निर्देश के पालन की समीक्षा कर रहा है। अदालत चाहती है कि सभी मामलों का समय पर निपटारा हो। इससे न्याय व्यवस्था में पारदर्शिता बनी रहती है। प्रशासनिक प्रक्रिया भी अधिक जवाबदेह बनती है। अदालत ने सरकार से निर्धारित समयसीमा का पालन करने को कहा। 30 जुलाई की बैठक इस मामले में अहम मानी जा रही है। उसके निर्णयों पर कोर्ट आगे की सुनवाई करेगा। सरकार की रिपोर्ट के बाद अगला आदेश जारी किया जाएगा। यह मामला राज्य की न्यायिक व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।


