झारखंड हाईकोर्ट ने वर्ष 1990 के एक गोलीकांड मामले में लक्ष्मीकांत दास की सजा में संशोधन किया है। अदालत ने धारा 307 आईपीसी के तहत मिली सजा को धारा 324/34 आईपीसी में बदल दिया। आर्म्स एक्ट की धारा 27 के आरोप से लक्ष्मीकांत दास को बरी कर दिया गया। अदालत ने इस मामले में उसे संदेह का लाभ दिया। ट्रायल कोर्ट ने उसे वर्ष 2003 में सात वर्ष की सजा सुनाई थी। इसके अलावा आर्म्स एक्ट की धारा 27 में तीन वर्ष की सजा दी गई थी। हाईकोर्ट ने धारा 324 के तहत पहले जेल में बिताए पांच माह 15 दिन को ही सजा माना। लक्ष्मीकांत दास पहले से जमानत पर था। अदालत ने उसे जमानत बांड की जिम्मेदारी से भी मुक्त कर दिया। मामले में हाईकोर्ट ने उसकी आपराधिक अपील को आंशिक रूप से स्वीकार किया। फैसला पुराने आपराधिक मामले में उपलब्ध साक्ष्यों की समीक्षा के बाद आया।
मामला 13 जून 1990 को सरायकेला थाना क्षेत्र के घाघी गांव में हुई घटना से जुड़ा है। अभियोजन के अनुसार, घासीराम महतो और उनके भाई कंद्रू महतो बाड़ी में बाउंड्री का काम कर रहे थे। इसी दौरान लक्ष्मीकांत दास, अमूल्य कुमार दास और ज्ञानी दास वहां पहुंचे थे। आरोप है कि तीनों ने बाउंड्री बनाने से मना किया था। इसके बाद विवाद बढ़ने पर अमूल्य दास ने तीर चलाया था। तीर निशाने पर नहीं लगा था। इसके बाद लक्ष्मीकांत दास पर बंदूक से फायरिंग करने का आरोप लगा। गोली के छर्रे लगने से घासीराम, कंद्रू और रंजीत महतो घायल हुए थे। घटना के बाद सरायकेला थाने में कांड संख्या 41/1990 दर्ज की गई थी। ट्रायल कोर्ट ने 16 अप्रैल 2003 को लक्ष्मीकांत को धारा 307 में सात वर्ष की सजा सुनाई थी। आर्म्स एक्ट की धारा 27 में भी उसे तीन वर्ष की सजा मिली थी। दोनों सजाओं को साथ चलाने का आदेश दिया गया था। अमूल्य दास और ज्ञानी दास को भी धारा 307/34 के तहत सात वर्ष की सजा मिली थी। अपील लंबित रहने के दौरान दोनों की मृत्यु हो गई।
इसके बाद हाईकोर्ट में मामले की सुनवाई लक्ष्मीकांत दास की अपील तक सीमित रही। अदालत ने अभियोजन की ओर से पेश किए गए साक्ष्यों की विस्तार से समीक्षा की। मामले में कुल 11 गवाहों की गवाही कराई गई थी। हालांकि जांच अधिकारी को अदालत में पेश नहीं किया गया था। तीन घायल व्यक्तियों ने गोली के छर्रे लगने की बात कही थी। लेकिन घायलों से संबंधित इंजरी रिपोर्ट रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं थी। डॉक्टर भी चोटों की प्रकृति के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं दे सके। अदालत ने घटनास्थल से छर्रे और खाली कारतूस बरामद नहीं होने को भी ध्यान में रखा। अमूल्य दास के घर से बंदूक, उसका लाइसेंस और एक खाली कारतूस जब्त किया गया था। लेकिन हथियार की बैलिस्टिक जांच से संबंधित रिपोर्ट रिकॉर्ड में नहीं थी। इसलिए जब्त बंदूक को घटना में इस्तेमाल हथियार से जोड़ने का ठोस आधार नहीं मिला। अदालत ने यह भी देखा कि बंदूक का लाइसेंस अमूल्य दास के नाम पर था। अमूल्य दास ने अपने धारा 313 सीआरपीसी के बयान में आत्मरक्षा में हवा में गोली चलाने की बात कही थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 313 सीआरपीसी के तहत आरोपी को अपना बचाव रखने का महत्वपूर्ण अधिकार मिलता है। अदालत को आरोपी के इस बयान पर भी उचित रूप से विचार करना होता है। हाईकोर्ट ने माना कि गोली चलने की घटना को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता। हालांकि उपलब्ध साक्ष्यों से यह निश्चित नहीं हुआ कि फायरिंग लक्ष्मीकांत दास ने ही की थी। अदालत ने तीन अलग-अलग स्थानों पर छर्रे लगने और मौके से एक खाली कारतूस मिलने के तथ्य पर भी विचार किया। कोर्ट के अनुसार, धारा 307 आईपीसी के लिए जरूरी हत्या की मंशा या ऐसी जानकारी लक्ष्मीकांत के खिलाफ पर्याप्त रूप से साबित नहीं हुई। हालांकि गोली चलने की घटना और खतरनाक हथियार से चोट पहुंचाने के आधार पर धारा 324/34 आईपीसी के तहत दोष सिद्ध माना गया। आर्म्स एक्ट की धारा 27 के मामले में भी अदालत ने पर्याप्त प्रमाण नहीं पाया। कोर्ट ने कहा कि बंदूक अमूल्य दास के नाम पर थी और फायरिंग के संबंध में स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध नहीं था। घटना वर्ष 1990 की होने और आरोपी के लंबे समय से मुकदमे का सामना करने को भी अदालत ने ध्यान में रखा। लक्ष्मीकांत पहले ही पांच माह 15 दिन न्यायिक हिरासत में रह चुका था। इसलिए धारा 324 के तहत उसे अलग से जेल की सजा देने के बजाय पहले बिताई अवधि को ही पर्याप्त माना गया। अदालत ने ट्रायल कोर्ट के 16 अप्रैल 2003 के आदेश को इसी सीमा तक संशोधित कर अपील आंशिक रूप से स्वीकार कर ली।



