रांची में झारखंड हाईकोर्ट ने वर्ष 1947 के भूमि हस्तांतरण से जुड़े विवाद में महत्वपूर्ण निर्णय दिया। न्यायमूर्ति एसके द्विवेदी की अदालत ने लंबित मामले का निस्तारण किया। कोर्ट ने एसएआर अपीलीय और पुनरीक्षण प्राधिकार के आदेशों को निरस्त कर दिया। अदालत ने कहा कि बहाली की कार्यवाही बहुत अधिक विलंब से शुरू की गई थी। इसलिए यह कानून की निर्धारित समय सीमा से बाहर थी। अदालत ने रेस-ज्यूडिकाटा के सिद्धांत को भी लागू माना। अमर कुमार चौधरी की याचिका स्वीकार कर ली गई। वर्ष 2008 के दोनों आदेश रद्द कर दिए गए। वर्ष 1988 के मूल एसएआर आदेश को अंतिम और प्रभावी माना गया। हालांकि इस संबंध में मंत्री कार्यालय की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
याचिकाकर्ता के अनुसार उनके पिता ने वर्ष 1947 में 1.32 एकड़ भूमि खरीदी थी। परिवार लगातार उस भूमि पर कब्जे में रहा। वर्ष 1962 में भूमि विवाद सामने आया था। इसके बाद टाइटल सूट दायर किया गया। वर्ष 1965 में समझौते के आधार पर मुकदमे का निपटारा हुआ। वर्ष 1986-87 में एसएआर वाद शुरू हुआ। 26 अगस्त 1988 को अधिकारी ने समान क्षेत्रफल की दूसरी भूमि देने का आदेश पारित किया। आदेश के अनुसार बिक्री विलेख का पंजीकरण कराया गया। म्यूटेशन भी पूरा हुआ। इस आदेश को कभी चुनौती नहीं दी गई।
बाद में वर्ष 2006 में फिर नया एसएआर वाद दायर किया गया। एसएआर अधिकारी ने इसे रेस-ज्यूडिकाटा के आधार पर खारिज कर दिया। अपीलीय प्राधिकारी ने दोनों पुराने आदेशों को रद्द कर कब्जा देने का निर्देश दिया। प्रमंडलीय आयुक्त ने भी उस निर्णय को बरकरार रखा। हाईकोर्ट ने कहा कि दूसरा वाद कानून की दृष्टि से स्वीकार्य नहीं था। अदालत ने रिकॉर्ड पर मौजूद गवाहों के बयानों को महत्वपूर्ण माना। कोर्ट ने पाया कि भूमि पर संरचना होने के पर्याप्त प्रमाण मौजूद थे। सरकार इस दावे का प्रभावी खंडन नहीं कर सकी। इसी आधार पर अपीलीय और पुनरीक्षण आदेशों को रद्द करते हुए वर्ष 1988 का मूल आदेश प्रभावी बनाए रखा।



