रांची में झारखंड हाईकोर्ट ने हजारीबाग में अवैध पत्थर खनन मामले पर कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने सवानी नदी, तपसा गांव और इचाक क्षेत्र में अवैध खनन पर गंभीर चिंता जतायी है। हाईकोर्ट ने कहा कि यह केवल प्रशासनिक लापरवाही का मामला नहीं है। कोर्ट के अनुसार इससे लोगों के जीवन और पर्यावरण दोनों को नुकसान पहुंच रहा है। चीफ जस्टिस एम एस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई की। कोर्ट ने जिला प्रशासन, खनन विभाग, पुलिस और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को फटकार लगायी। अदालत ने कहा कि जिम्मेदार एजेंसियां अपने कर्तव्यों का सही तरीके से पालन नहीं कर रही हैं। अवैध खनन से खेती योग्य जमीन प्रभावित हो रही है। साथ ही सवानी नदी का प्राकृतिक संतुलन भी बिगड़ रहा है। कोर्ट ने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का उल्लंघन माना।
हाईकोर्ट ने कहा कि केवल एफआईआर दर्ज करना पर्याप्त कार्रवाई नहीं है। अदालत ने अधिकारियों की निष्क्रियता पर भी सवाल उठाया। कोर्ट ने कहा कि संबंधित अधिकारियों को कार्रवाई का कोई डर नहीं रह गया है। अदालत ने माना कि लगातार हो रही अवैध गतिविधियां प्रशासन की जानकारी के बिना संभव नहीं हैं। भारी मशीनों और ट्रकों के संचालन के बावजूद प्रशासन चुप बना रहा। कोर्ट ने मामले में 15 सख्त दिशा निर्देश जारी किये हैं। जिला स्तरीय टास्क फोर्स को हर महीने बैठक करने का आदेश दिया गया है। टास्क फोर्स की कार्यवाही वेबसाइट पर सार्वजनिक करनी होगी। कोर्ट ने सभी खनन लाइसेंस और पर्यावरण स्वीकृतियों की समीक्षा का आदेश दिया है। जांच पूरी होने तक खनन और स्टोन क्रशर संचालन पर रोक लगाने को कहा गया है।
हाईकोर्ट ने हजारीबाग वाइल्डलाइफ सेंचुरी के आसपास खनन पर प्रतिबंध दोहराया है। अदालत ने तकनीक आधारित निगरानी व्यवस्था लागू करने का निर्देश दिया। सीसीटीवी, जीपीएस ट्रैकिंग और जियो फेंसिंग प्रणाली लागू करने को कहा गया है। अवैध खनन की शिकायतों के लिए हेल्पलाइन और ईमेल सेवा शुरू होगी। जिला खनन पदाधिकारी को अवैध खनन में शामिल लोगों पर मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया गया है। पुलिस अधीक्षक को समयबद्ध जांच कर चार्जशीट दाखिल करने को कहा गया। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को अवैध इकाइयों की बिजली काटने का निर्देश मिला है। कोर्ट ने “पॉल्युटर पेज” सिद्धांत लागू करते हुए पर्यावरणीय मुआवजा लगाने का आदेश दिया। बंद खदानों को सुरक्षित कर पुनर्स्थापित करने के निर्देश भी दिये गये हैं। अदालत ने साफ कहा कि आदेशों का पालन नहीं होने पर संबंधित अधिकारी व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार होंगे।


